Monday, 15 July 2013

मौलिक अधिकार:एक विश्लेषण


संविधान सभी नागरिकों के लिए व्‍यष्टि और सामूहिक रूप से कुछ बुनियादी स्‍वतंत्रता देता है। इनकी मौलिक अधिकारों की छह व्‍यापक श्रेणियों के रूप में संविधान में गारंटी दी जाती है जो न्‍यायोचित हैं। संविधान के भाग III में सन्निहित अनुच्‍छेद 12 से 35 मौलिक अधिकारों के संबंध में है। ये हैं......
  1. समानता का अधिकार जिसमें कानून के समक्ष समानता, धर्म, वंश, जाति लिंग या जन्‍म स्‍थान के आधार पर भेदभाव का निषेध शामिल है, और रोजगार के संबंध में समान अवसर शामिल है।
  2. भाषा और विचार प्रकट करने की स्‍वतंत्रता का अधिकार, जमा होने संघ या यूनियन बनाने, आने-जाने, निवास करने और कोई भी जीविकोपार्जन एवं व्‍यवसाय करने की स्‍वतंत्रता का अधिकार (इनमें से कुछ अधिकार राज्‍य की सुरक्षा, विदेशी देशों के साथ भिन्‍नतापूर्ण संबंध सार्वजनिक व्‍यवस्‍था, शालीलनता और नैतिकता के अधीन दिए जाते हैं)।
  3. शोषण के विरुद्ध अधिकार, इसमें बेगार, बाल श्रम और मनुष्‍यों के व्‍यापार का निषेध किया जाता है।
  4. आस्‍था एवं अन्‍त:करण की स्‍वतंत्रता, किसी भी धर्म का अनुयायी बनना, उस पर विश्‍वास रखना एवं धर्म का प्रचार करना इसमें शामिल हैं।
  5. किसी भी वर्ग के नागरिकों को अपनी संस्‍कृति सुरक्षित रखने, भाषा या लिपि बचाए रखने और अल्‍पसंख्‍यकों को अपनी पसंद की शैक्षिक संस्‍थाएं चलाने का अधिकार; और
  6. मौलिक अधिकार के प्रवर्तन के लिए सांवैधानिक उपचार का अधिकार।

चाणक्य नीति:वर्तमान में प्रासंगिकता


चाणक्यनीति के मूल में स्वार्थ नहीं, बल्कि परमार्थ है। यही कारण है कि चाणक्य ने अपने ग्रंथ के पहले ही श्लोक में तीन लोकों के नाथ ईश्वर को प्रणाम कर अपने ग्रंथ का मंगलाचरण करते हैं। ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करना ही चाणक्य की राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत है। यदि किसी भी शासक को राजनीति में सफल होना है, तो उसे ईश्वर के अस्तित्व और धर्म के मूलभूत सिद्धांतों में श्रद्धा रखनी होगी।

चाणक्य नीति का महत्व.... 

चाणक्यनीति के मूल में स्वार्थ नहीं, बल्कि परमार्थ है। यही कारण है कि चाणक्य ने अपने ग्रंथ के पहले ही श्लोक में तीन लोकों के नाथ ईश्वर को प्रणाम कर अपने ग्रंथ का मंगलाचरण करते हैं। ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करना ही चाणक्य की राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत है। 

यदि किसी भी शासक को राजनीति में सफल होना है, तो उसे ईश्वर के अस्तित्व और धर्म के मूलभूत सिद्धांतों में श्रद्धा रखनी होगी........

आज देश की राजनीति का स्वरूप लगातार बदल रहा है। नहीं बदल रहा है, तो वह है नेताओं का चरित्र। इतना अवश्य जान लें कि जिस देश के राजनेता राजनीति के मूल सिद्धांतों को अच्छी तरह समझकर उसे अमल में लाएँगे, तो उस देश की प्रजा उतनी ही अधिक सुखी होगी और शासन यशस्वी बनेंगे। यह सच आज भारतीय राजनीति से बहुत दूर है। यहाँ प्रजा तो सुखी नहीं है, अलबत्ता राजनेता अपनी भावी पीढ़ियों के साथ बहुत ही अधिक खुश हैं। इन दिनों पूरे विश्व में अचानक कौटिल्य के अर्थशास्त्र की माँग बढ़ गई है। विदेशों के तथाकथित मैनेजमेंट गुरु भी कंपनियों के सफल संचालन के लिए कौटिल्य के सूत्र वाक्यों को अमल में लाने लगे हैं। कौटिल्य का अर्थशास्त्र तो लोकप्रिय है ही, इसके अलावा राजनीति पर उनकी लिखी किताब भी महत्वपूर्ण है। आज कौटिल्य के अर्थशास्त्र की तरह चाणक्यनीति भी विख्यात है। सबसे पहले यह भ्रम दूर कर लें कि चाणक्य और कौटिल्य अलग-अलग हैं। वास्तव में चाणक्य और कौटिल्य एक ही व्यक्ति का नाम है।
जब भी कहीं चाणक्य राजनीति की बात आती है, तब हम समझते हैं कि यह किताब कुटिलता से भरपूर होगी। इसमें यह बताया गया होगा कि किस तरह से राजनीति में प्रतिद्वंद्वी को परास्त करें और सत्ता हासिल करें। चाणक्यनीति के बारे में यह हमारी भूल है कि हम ऐसा समझते हैं। दरअसल चाणक्यनीति के मूल में स्वार्थ नहीं, बल्कि परमार्थ है। यही कारण है कि चाणक्य ने अपने ग्रंथ के पहले ही श्लोक में तीन लोकों के नाथ ईश्वर को प्रणाम कर अपने ग्रंथ का मंगलाचरण करते हैं। ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करना ही चाणक्य की राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत है। यदि किसी भी शासक को राजनीति में सफल होना है, तो उसे ईश्वर के अस्तित्व और धर्म के मूलभूत सिद्धांतों में श्रद्धा रखनी होगी।
आज हमारे देश में सांप्रदायिक ताकतें लगातार बलशाली होती जा रहीं हैं। इसके रहते कोई भी शासक सफल नहीं हो सकता। इसे ही ध्यान में रखकर अपनी दूरदर्शिता दिखाते हुए चाणक्य ने ग्रंथ लिखा। अपने ग्रंथ के बारे में चाणक्य पूरी तरह से स्पष्ट हैं। चाणक्य कहते हैं ‘मैं यहाँ प्रजा के कल्याण के लिए राजनीति के ऐसे रहस्यों का उद्घाटन करुँगा, जिसे जानने के बाद व्यक्ति सर्वज्ञ बन जाएगा।’ यहाँ पर चाणक्य ने व्यक्ति के लिए जिस सर्वज्ञ शब्द कहा है, उसका आशय यही है कि ऐसा व्यक्ति संसार के सभी व्यवहारों को समझने लगेगा, अर्थात वह पूर्णत: व्यावहारिक हो जाएगा। उसका संबंध आध्यात्मिक जगत के साथ नहीं होगा। आध्यात्मिक दृष्टि प्राप्त करने वाले तो महात्मा होते हैं। चाणक्य दावे के साथ कहते हैं कि जो व्यक्ति मेरे ग्रंथ से राजनीति के इस विज्ञान को समझेगा, वही प्रजा का कल्याण कर पाएगा। चाणक्य ने यहाँ पर ज्ञान नहीं, बल्कि विज्ञान शब्द का प्रयोग किया है। राजनीति के सिद्धांतों का अभ्यास करने की क्रिया को ही ज्ञान कहा जाता है। इसे समाज के एक-एक व्यक्ति के हित में उसका उपयोग करना विज्ञान कहलाता है। ज्ञान की अपेक्षा विज्ञान अधिक सारगर्भित है। चाणक्य यह दावा नहीं करते कि इस ग्रंथ में जो कुछ लिखा गया है, वह मौलिक है। पहले ही श्लोक में वे कहते हैं कि अनेक शास्त्रों में से चुन-चुनकर राजनीति की बातों का संपादित किया है। इस वाक्य में ही चाणक्य की ईमानदारी और पारदर्शिता झलकती है। आज का युग चाणक्य के पाठकों को अँधेरे में रखना नहीं चाहता। वे स्पष्ट रूप से कुबूल करते हैं कि मैंने तो राजनीति के सिद्धांतों का संकलन ही किया है। इस तरह से संकलित कर चाणक्य ने अनेक पूर्व महर्षियो के ज्ञान की धरोहर को जीवंत रखा है और हम तक उसे पहुँचाने का पुण्य कार्य किया है।
किसी भी ग्रंथ को पढ़ने और उसे अमल में लाने के पहले हमें यह जान लेना आवश्यक है कि इस ग्रंथ का अभ्यास करने से हमें क्या लाभ होगा? चाणक्य ने पने ग्रंथ के प्रारंभ में ही इस प्रश्न का उत्तर दे दिया है। चाणक्य कहते हैं कि इस नीतिशास्त्र को सही अर्थो में समझा है, तो वे यह अच्छी तरह से जान जाएँगे कि कौन-सा कार्य अच्छा है और कौन-सा बुरा। इस माध्यम से उन्होंेने उत्तम मनुष्य की व्याख्या भी कर दी है। उत्तम मनुष्य उसे कहते हैं, जो नीतिशास्त्र केमूल सिद्धांतों को स्वयं अमल में लाए, उसके आधार पर प्रजा को क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए, यह भी स्पष्ट हो जाएगा। ईष्ट क्या है और अनिष्ट कय है, इसका भी बोध यह ग्रंथ कराएगा। चाणक्य का नीतिशास्त्र प्रजा को सुखी बनाने का शास्त्र है। कोई भी व्यक्ति, जो सुखी होना चाहता है, उसे जीवन को दु:खी बनाने वाले तत्वों की पहचान पहले कर लेनी चाहिए। चाणक्य का नीतिशास्त्र बहुत ही व्यावहारिक बातें करता है। इसी कारण सुख के साधनों की तलाश करने के बदले दु:ख पैदा करने वाले साधनों को पहचान लेना चाहिए, ताकि सुख प्राप्त करने में ये तत्व बाधक न बनें। आखिर कहाँ हैं ये दु:ख देने वाले तत्व? चाणक्य कहते हैं ‘मूर्ख व्यक्ति को दिया जाने वाला उपदेश, कुलटा स्त्री का भरण-पोषण और दु:खी लोगों का संसर्ग विद्वानों को भीे दु:खी बना देता है। ’ जिसे सुखी होना है, उसे कभी भी मूर्ख व्यक्ति को उपदेश नहीं देना चाहिए। कुलटा स्त्री का भरण-पोषण नहीं करना चाहिए। यहाँ पर दुखियारों की मदद करना निषेध नहीं माना है, पर उसके साथ रहने का निषेध किया गया है। क्योंकि उसका संक्रमण अवश्य होगा।

जैन शास्त्रों में भी लिखा गया है कि मूर्ख व्यक्ति को उपदेश देना ऐसा है, जैसे खुजली वाले कुत्ते के शरीर पर चंदन का लेप मलना। ये बेकार की मेहनत है। इसका कोई परिणाम नहीं निकलेगा। इससे निराशा ही मिलती है। बारिश में भीगने वाले बंदर से पेड़ के पक्षियों ने घोसला बनाने की सलाह दी। इससे क्रोधित होकर बंदर ने पक्षियों के घोसलों को ही नष्ट कर दिया। सइी तरह कुलटा स्त्री साँप की तरह है, जिसे दूध पिलाकर हम यह समझें कि हमने उस पर दया की। जो दया करने वाले के प्रति फादारी नहीं कर सकती, उसका भरण-पोषण करना पति का कर्तव्य नहीं है। आज का कानून भी पति से बेवफाई करने वाली स्त्री से तलाक लेने की सलाह देता है। दु:खी मनुष्यों में से एक प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा प्रवाहित होती है। इस कारण ऐसे लोगों के साथ रहने वाला भी निराशावादी हो जाता है। जिन्हें आशावादी बनना हो, उसे आशावादियों के साथ रहना चाहिए। सोहबत का असर इंसानों पर ही सबसे पहले होता है। यह चाणक्य बहुत पहले कह गए हैं।
बाद के श्लोक में चाणक्य मनुष्य के जीवन के लिए सबसे अधिक हानिकारक चार तत्वों की बात करते हैं। चाणक्य कहते हैं ‘दुष्ट पत्नी, शठ मित्र, आज्ञा न मानने वाले नौकर और घर में बसने वाला साँप’ ये चारों मृत्यु के समान हैं। पति और पत्नी संसाररूपी रथ के दो पहिए है, यदि पत्नी दुष्ट हो, तो जीवन के हर कदम पर अवरोध पैदा होते हैं और संसार का यह रथ बराबर चल नहीं पाता। रणभूमि पर शत्रुओं का वीरतापूर्वक मुकाबला करने वाला पराक्रमी योद्धा भी पत्नी के सामने लाचार बन जाता है। दुष्ट पत्नी अपने पति के लिए अभिशाप होती है। वह सज्जन पुरुष का जीवन हराम कर देती है। पत्नी दुष्ट हो, तो घर से सुख-शांति हमेशा के लिए चली जाती है। जिस घर में शांति न हो, उसका समाज में भी कोई मान-सम्मान नहीं होता। पत्नी बेवफा हो, तो अरबों की दौलत भी सुख नहीं दे सकती।
इंसान की सबसे बड़ी पूँजी उसकी संतान और मित्र है। जिन्हें अच्छे मित्र मिले, वह विश्व का सबसे भाग्यशाली व्यक्ति है। जिन्हें धूर्त मित्र मिले हैं, वह विश्व का सबसे बड़ा दुर्भाग्यशाली व्यक्ति है। मनुष्य किसी भी व्यक्ति के साथ मित्रता करे, तब उसे उसके दुगरुणों के बारे में जानकारी नहीं होती, उसे यह विश्वास होता है कि मुसीबत के समय सहायता करने वालों में यही सबसे आगे होगा। मित्र तो सहायता करेगा ही। वास्तव में जीवन में जब बाधाएँ आती हैं और तब हमने मित्र से सहायता की अपेक्षा रखी हो, तभी वह धोखा दे जाए, तो कैसा लगता है? समाज में दूसरे लोग हमारे साथ धोखाधड़ी करते हैं, तब हमें आघात नहीं लगता, पर जब मित्र ही हमसे धोखा करने लगे, तो उस आघात को सहना बहुत ही मुश्किल होता है। इसी तरह मालिक का आदेश न मानने वाला नौकर भी खतरनाक होता है। घर में जब मेहमान आएँ हो, उस समय यदि उसे कोई आदेश दिया जाए, तभी नौकर सेठ का अपमान कर दे, तो यह बात सेठ के लिए बहुत ही अधिक आघातजनक होगी।
लोग यह दलील देते हैं कि चाणक्य आज से 2400 वर्ष पूर्व पैदा हुए थे। उसके समय की राजनीति और आज की राजनीति में जमीन-आसमान का अंतर है। तो उसका जवाब यह है कि चाणक्य ने अपने ग्रंथ में राजनीति के शाश्वत सिद्धांतों की चर्चा की है। राजनीति के साथ-साथ उन्होंने समाजशास्त्र के महत्वपूर्ण सिद्धांतों को भी समझाया है। यह सिद्धांत प्राचीन काल में जितने प्रासंगिक थे, आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। देश में राजशाही हो या लोकशाही, पर राजनीति के सिद्धांत कभी नहीं बदलते। जो राजनेता सिद्धांतों की जानकारी प्राप्त कर लेते है, वे अपने आप को देश, काल और परिस्थितियों के अनुरूप ढाल सकते हैं।

गाँधी और अम्बेडकर:एक विवेचन


पिछले दो-तीन दशकों का एक बड़ा राजनीतिक यथार्थ यह है कि राष्ट्रपिता के रूप में समादृत गांधी के ऊपर डॉ भीमराव आंबेडकर को न सिर्फ खड़ा करने, बल्कि गांधी को आंबेडकर और दलित विरोधी भी सिद्ध करने की कोशिश लगातार की जा रही हैं। यह सब हो रहा है आंबेडकर के नाम पर दलित राजनीति करने वाले आंबेडकरवादियों द्वारा, क्योंकि इसके जरिए उनके लिए एक समुदाय विशेष के वोट हथियाना सुविधाजनक हो जाता है, जबकि आज की वोट-बटोरू राजनीति में गांधी किसी समुदाय या जाति विशेष के लिए कोई प्रासंगिकता नहीं रखते।
ऐसे परिदृश्य में गांधी और आंबेडकर के आपसी संबंधों की पड़ताल भी आंबेडकरवादियों के आचरण के आधार पर की जाने लगी है। मगर जिस तरह गांधी को सरकारी या मठी गांधीवादियों के आचरण के आधार पर देखना सही नहीं होगा, वैसे ही गांधी और आंबेडकर के आपसी रिश्तों को आज के आंबेडकरवादियों के हंगामों, नारों, व्यवहारों के आधार पर सही-सही नहीं समझा जा सकता। इसके लिए जरूरत है एक दूसरे के प्रति दोनों के विचारों और व्यवहारों की तह में जाने की।
सब जानते हैं कि गांधी जहां एक तरफ राष्ट्रीय स्वाधीनता के लिए संघर्षरत रहे, वहीं दूसरी तरफ वे अपने रचनात्मक कार्यक्रम में अस्पृश्यता-निवारण, स्त्रियों की दशा में सुधार, राष्ट्रभाषा और देशी शिक्षा और खादी-प्रचार आदि को शामिल कर सामाजिक और आर्थिक रूपांतरण के लिए भी जीवनपर्यंत प्रयासरत रहे। डॉ आंबेडकर का ताल्लुक अस्पृश्य कही जाने वाली जातियों के हक की लड़ाई तक सीमित था।
आंबेडकर की दृष्टि में चूंकि हिंदू वर्ण-व्यवस्था ही अस्पृश्यता की जननी थी, इसलिए वे वर्ण-व्यवस्था को समूल नष्ट करने के पक्षधर थे, जबकि गांधी स्वाधीनता-संग्राम की एक रणनीति के तहत वर्ण-व्यवस्था के विरुद्ध मुहिम चलाने से परहेज करते हुए अस्पृश्यता उन्मूलन के जरिए अस्पृश्य जातियों को सामाजिक समता और सम्मान का जीवन दिलाने के लिए अपने सत्याग्रह-अस्त्र का प्रयोग करते रहे। दोनों में मतभेद का यही बुनियादी कारण था।
आमतौर पर यह समझा जाता है कि गांधी ने आंबेडकर की अस्पृश्यता विरोधी मुहिम से प्रभावित होकर अस्पृश्यता-उन्मूलन को अपने रचनात्मक कार्यक्रम का हिस्सा बनाया। लेकिन यह सच नहीं है। गांधी भारतीय राजनीति में आंबेडकर के उदय के पहले से ही छुआछूत के विरुद्ध अपनी मुहिम शुरू कर चुके थे। 1915 में जब गांधी ने दक्षिण अफ्रीका से वापसी के बाद अमदाबाद के कोचरब में आश्रम की स्थापना की (जिसे बाद में साबरमती ले जाया गया), उसी समय बहुतेरे आश्रमवासियों के विरोध के बावजूद उन्होंने अछूत दंपति दादू भाई को सपरिवार आश्रम में प्रवेश देकर छुआछूत के विरुद्ध अपनी मुहिम की शुरुआत कर दी।
बाद में इस दंपति की बेटी लक्ष्मी को उन्होंने अपनी दत्तक पुत्री के रूप में स्वीकार किया। 1920-22 के असहयोग आंदोलन के दौरान भी गांधी ने अस्पृश्यता के विरुद्ध देशव्यापी जागृति पैदा करने की कोशिश की, जिसके लिए उन्हें कई स्थानों पर सवर्ण हिंदुओं के आक्रोश का शिकार होना पड़ा। 1932 में उनके द्वारा हरिजनों के लिए मंदिर प्रवेश का आंदोलन चलाने का एक अलग ही इतिहास है।
लेकिन 1920 के दशक में भारतीय रंगमंच पर एक दहकते गोले की तरह आ धमकने वाले आंबेडकर गांधी के  अस्पृश्यता विरोधी इन प्रयासों से संतुष्ट नहीं थे और उन्होंने अपना अलग मोर्चा खोल कर इसकेखिलाफ लड़ाई को तीव्र करने की तरकीब अपनाई। उनकी इस मुहिम में मील का पत्थर बना उनके द्वारा 1927 में महाराष्ट्र के कोलाबा जिले में अछूतों के लिए पानी के सवाल को लेकर किया गया आंदोलन।
लेकिन इस आंदोलन में आंबेडकर के मन में गांधी के प्रति वितृष्णा नहीं थी। मराठी और हिंदी के प्रसिद्ध दलित लेखक सूर्यनारायण रणसुभे 'वागर्थ' (अक्तूबर 2009) में छपे अपने लेख 'अभिशप्त चिंतन से इतिहास की ओर' में बताते हैं कि 'महार सत्याग्रह के समय मंच पर एक ही तस्वीर थी, वह महात्मा गांधीजी की थी।'
दरअसल, आंबेडकर की दूरी गांधी से तब ज्यादा बढ़ी, जब वे अंग्रेजों की कूटनीतिक चाल के शिकार होकर 1931 में लंदन में आयोजित दूसरे गोलमेज सम्मेलन में अछूतों के प्रतिनिधि बन कर शामिल हुए। वहां वे खुल कर गांधी का विरोध करते हुए अछूतों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल की मांग पर डटे रहे और 1932 में ब्रिटिश शासन ने यह काम कर भी दिया। लेकिन सदाशयता और राष्ट्रीय हित की भावना से सराबोर आंबेडकर जल्द ही ब्रिटिश शासन की इस धूर्तता को समझ गए।
यही कारण था कि सितंबर 1932 में गांधी ने जब पृथक निर्वाचन मंडल के विरुद्ध आमरण अनशन किया, तो उनके जीवन को बचाने के लिए आंबेडकर ने पूना समझौते पर हस्ताक्षर करने में संकोच नहीं किया। महार आंदोलन के समय मेज पर गांधी की तस्वीर रखने वाले आंबेडकर ने पुन: गांधी के साथ सहमति के बढ़ते कदम के प्रमाण दिए, जिसकी चरम परिणति संविधान सभा की मसविदा समिति के उनके अध्यक्ष बनने में हुई।
आंबेडकर के प्रति गांधीजी का रवैया हमेशा अपनत्व और सम्मान का रहा। दूसरे गोलमेज सम्मेलन के अवसर पर गांधी ने कई अवसरों पर आंबेडकर के प्रति सौमनस्य का परिचय दिया। मसलन, छह अक्तूबर 1931 को लंदन की एक सभा में गांधी ने कहा- ''डॉ आंबेडकर की बात का मैं बुरा नहीं मानता, हर एक अस्पृश्य की तरह डॉ   आंबेडकर को मुझ पर थूकने तक का अधिकार है और वे मुझ पर थूकें तो भी मैं हंसता रहूंगा।'' 
इसके बाद 26 अक्तूबर 1931 को आॅक्सफोर्ड भारतीय मजलिस में भाषण करते हुए गांधी ने कहा- ''डॉ आंबेडकर के प्रति मेरे मन में बड़ा सम्मान है। उन्हें कटु होने का पूरा अधिकार है। अगर वे हमारा सिर नहीं फोड़ देते तो इसी को उनका बहुत बड़ा आत्म-संयम मानना चाहिए।'' फिर 22 अक्तूबर 1931 को मिर्जा इस्माइल को लिखे पत्र में भी गांधी का यह कथन ध्यान में रखने योग्य है- ''प्रिय सर मिर्जा, यदि आप डॉ आंबेडकर को मना सकें तो यह आपकी बड़ी भारी जीत होगी। दक्षिण अफ्रीका में मैंने खुद वह सब झेला था, जो वे झेलते रहे हैं। इसलिए उनकी सब बातों के प्रति मेरी सहानुभूति है। उनके साथ मधुरतम व्यवहार करना चाहिए।''
गांधी जब 1933 में 'हरिजन' पत्रिका का प्रकाशन शुरू करने चले तो उसके प्रथम अंक में ही उन्होंने डॉ आंबेडकर का संदेश मंगा कर छापा। गांधी के दृढ़ आग्रह के कारण ही कांग्रेस को आंबेडकर को संविधान मसविदा समिति का अध्यक्ष बनाने पर राजी होना पड़ा।
दूसरी तरफ आंबेडकर के मन में भी गांधी की कई बातों को लेकर सकारात्मक रुख रहा। इसे पूर्वोक्त लेख में रणसुभे बताते हैं- एक, ''दलितों से डॉ आंबेडकर ने अपील की थी- जिस व्यवसाय में गंदगी नहीं है, अथवा जो व्यवसाय किसी विशिष्ट जाति का नहीं है ऐसा कोई व्यवसाय वे (दलित) कर सकें तो ठीक रहेगा। हमारे मतानुसार इस वक्त ऐसा एक ही व्यवसाय है और वह है खादी बेचने का। दलित से मेरी व्यक्तिगत सिफारिश है कि वे खादी बुनने का काम करें। दलितों को खुद का कपड़ा खरीदना ही पड़ता है तो अगर सभी दलित खादी के कपड़े पहनना शुरू कर दें और दलितों द्वारा बुनी गई खादी को ही खरीदने का निर्णय ले लें, तो बुनाई के धागों के लिए अन्यों के पास जाने की जरूरत नहीं।''
दो, ''जब डॉ बाबासाहब ने अंतरजातीय विवाह कर लिया, तब उनका अभिनंदन करने वाला पत्र सरदार वल्लभ भाई ने उनको भेजा। सरदार ने कहा- ''अगर इस समय बापू होते तो वे आपको आशीर्वाद देते।'' इसके उत्तर में लिखे पत्र में बाबासाहब ने लिखा- ''बापू अगर आज जीवित होते, तो उनके आशीर्वाद हम दोनों को निश्चित ही प्राप्त होते- ऐसा जो आपने लिखा है, उससे मैं सहमत हूं।''
इन बातों के अतिरिक्त गांधी के साथ आंबेडकर के लगाव को इस बात में भी देखा जाना चाहिए कि उन्होंने अपने संघर्ष के लिए गांधीवादी मार्ग ही चुना। सवर्णवाद के विरुद्ध अपनी लड़ाई में या सामाजिक इंकलाब के लिए उन्होंने कभी हिंसक मार्ग का अनुगमन नहीं किया, यहां तक कि शाब्दिक हिंसा (गाली-गलौज)- जो आज के कतिपय आंबेडकरवादियों का प्रिय शगल है- का भी सहारा नहीं लिया। आज मार्क्सवाद, वामवाद से आंबेडकर की पटरी बैठाने वाले वामपंथी और दलितपंथी बुद्धिजीवी भूल जाते हैं कि आंबेडकर ने सामाजिक रूपांतरण के लिए न हिंसा की वांछनीयता स्वीकार की, न सत्ता बंदूक की नली से पैदा होती है जैसे जुमले के वे कायल हुए। धरना, प्रदर्शन, संवैधानिक तरीके ही उनके संघर्ष के अस्त्र रहे।
जहां तक धर्म का सवाल है, उन्होंने उसे 'अफीम' कह कर खारिज नहीं किया। इस मामले में भी वे गांधी के साथ चलते दिखाई देते हैं। जिन जातियों के लोग सदियों से सामाजिक उत्पीड़न से मुक्ति के लिए धर्मांतरण को सहज विकल्प के रूप में स्वीकार करते आ रहे थे उनमें बाबासाहब ने यह आत्मविश्वास पैदा किया कि जहां हो, वहीं पर अपनी मुक्ति की लड़ाई लड़ कर अपनी दशा को बदल सकते हो। 
जीवन के अंतिम दिनों में उनके द्वारा बौद्ध धर्म अंगीकार करना मूल हिंदू धर्म से पलायन नहीं था, बल्कि हिंदू धर्म की एक शाखा विशेष के प्रति आस्था प्रकट करना था। उन्हें वितृष्णा सवर्णवाद से थी, सवर्ण जातियों से नहीं, अन्यथा वे 1948 में डॉ सविता नाम की एक ब्राह्मणी विधवा से विवाह न करते। दूसरी तरफ गांधी भी आंबेडकर के वर्ण-व्यवस्था के विरोध से अप्रभावित नहीं रह सके, और 1932 से वर्ण-व्यवस्था के पक्ष में कुछ भी सकारात्मक कहना बंद कर वे अंतरजातीय विवाह के पक्षधर बन गए।
वास्तव में गांधी और आंबेडकर एक दूसरे के विलोम के बजाय एक दूसरे के पूरक अधिक हैं। जहां गांधी ने दमित-भयभीत राष्ट्र में दर्प, निर्भीकता और जुझारूपन का संचार किया, वहीं आंबेडकर ने देश की पीड़ित, दलित जातियों में आत्म-गौरव और मुक्ति का भाव जगाया। 
यह काम वैसा ही था जैसा मध्यकाल में कबीर का। यह कहने में तनिक असंगति नहीं कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद से त्रस्त भारतीय अवाम में गांधी ने नई जिंदगी की आशा पैदा की, तो सवर्णवाद, ब्राह्मणवाद के जुए तले कराहते दलित समुदाय में आंबेडकर ने नई चेतना का संचार किया। गांधी और आंबेडकर की इस सहधर्मी पूरकता को ध्यान में रख कर ही आज के दलित और गैर-दलित संयुक्त रूप से सामाजिक और राजनीतिक रूपांतरण के अधूरे कार्य को पूर्णता प्रदान कर सकते हैं।

पंचशील के सिद्धांत:एक मूल्यांकन


मानव कल्याण तथा विश्वशांति के आदर्शों की स्थापना के लिए विभिन्न राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक व्यवस्थावाले देशों में पारस्परिक सहयोग के पाँच आधारभूत सिद्धांत, जिन्हें पंचसूत्र अथवा पंचशील कहते हैं। इसके अंतर्गत ये पाँच सिद्धांत निहित हैं.....
(1) एक दूसरे की प्रादेशिक अखंडता और प्रभुसत्ता का सम्मान करना
(2) एक दूसरे के विरुद्ध आक्रामक काररवाई न करना
(3) एक दूसरे के आंतरिक विषयों में हस्तक्षेप न करना
(4) समानता और परस्पर लाभ की नीति का पालन करना तथा
(5) शांतिपूर्ण सह अस्तित्व की नीति में विश्वास रखना।
इतिहास......
29 अप्रैल, सन् 1954 ई. को तिब्बत संबंधी भारत-चीन समझौते में सर्वप्रथम इन पाँच सिद्धांतों को आधारभूत मानकर संधि की गई। पंचशील शब्द ऐतिहासिक बौद्ध अभिलेखों से लिया गया है जो कि बौद्ध भिक्षुओं का व्यवहार निर्धारित करने वाले पाँच निषेध होते हैं। तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने वहीं से ये शब्द लिया था। ये पाँच शील निम्नवत हैं:
1. हत्या न करना 2. चोरी न करना 3. व्यभिचार न करना 4. असत्य न बोलना 5. मद्दपान न करना
उक्त समझौते के आमुख रूप में पंचशील की मान्यता एशियाई-अफ्रीकी और बाद में अंतरराष्ट्रीय राजनीति में विभिन्न राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक व्यवस्थावाले देशों में मैत्री तथा सहयोग का आधार बनी। 25 जून, 1954 को चीन के प्रधान मंत्री श्री चाऊ एन लाई भारत की राजकीय यात्रा पर आए और उनकी यात्रा की समाप्ति पर जो संयुक्त विज्ञप्ति प्रकाशित हुई उसमें घोषणा की गई कि वे पंचशील के पाँच सिद्धांतों का परिपालन करेंगे। दोनों प्रधान मंत्रियों ने अंतरराष्ट्रीय व्यवहार और सहअस्तित्व के आवश्यक सिद्धांतों के रूप में पंचशील के सिद्धांतों की व्यापक घोषणा एवं मान्यता की।
फिर सन 1962 में चीन द्वारा भारत पर आक्रमण सें इस संधि की मूल भावना को काफ़ी चोट पहुँची.
विभिन्न राष्ट्रों द्वारा पंचशील के सिद्धान्तों पर आस्था.......
22 सितंबर, 1954 को हिंदेशिया के प्रधान मंत्री डाक्टर अली शास्त्रोमिद जोजो जब भारत की राजकीय यात्रा पर आए ता उन्होंने स्वागत भाषण में बताया कि हिंदेशिया की मूल रीति नीति पाँच सिद्धांतों के आधार पर है और उन्हें पांज्यसिला कहते हैं। इसके सिद्धांत हैं-
(1) जनता को प्रमुखता (2) मानववाद (3) ईश्वर में विश्वास तथा धार्मिक स्वतंत्रता (4) हिंदेशिया की राष्ट्रीय एकता (5) राष्ट्रीय समृद्धि।
इसी स्वागत आयोजन के भाषण में प्रधान मंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू ने तिब्बत संबंधी भारत चीन समझौते की चर्चा करते हुए घोषित किया कि वास्तव में ये पाँच सिद्धांत विश्वशांति एवं सहयोग की अधारशिला बन सकते हैं। ज्ञातव्य है कि प्राचीन भारत में मनुस्मृति में वर्णित धर्म के दस लक्षणों तथा बौद्धकाल में "पंसिका" - बौद्ध गृहस्थों के आचरण संबंधी पाँच सिद्धांतों- के रूप में भी इनका उल्लेख मिलता है। इन्हीं नियमों के कुछ भाव दूसरे रूप और आकर में अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक आचार व्यवहार का पंचसूत्री आधार बने हैं।
दिसंबर 1954 में यूगोस्लाविया के राष्ट्रपति मार्शल टीटो जब भारत की राजकीय यात्रा पर आए तो उन्होंने भी पंचशील तथा सहअस्तित्व के महत्व पर प्रकाश डाला। 23 दिसंबर को मार्शल टीटो तथा श्री नेहरू की जो संयुक्त विज्ञप्ति प्रकाशित हुई उसमें दोनों देशों की मैत्री एवं सहयोग संबंध का आधार पंचशील के पाँच सिद्धांत ही मान्य किए गए। इसमें कहा गया कि एक दूसरे की प्रभुसत्ता तथा स्वतंत्रता, अनाक्रमण, समानता, परस्परहित, और एक दूसरे देश द्वारा भीतरी मामलों में अहस्तक्षेप की नीति ही भारत यूगोस्लाविया की मैत्री तथा सहयोग संबंध का आधार रहेगी। इसी प्रकार 23 जून, 1955 ई. को भारत के प्रधान मंत्री श्री नेहरू की सोवियत संघ की राजकीय यात्रा की समाप्ति पर जो संयुक्त विज्ञप्ति प्रकाशित हुई, उसमें भी पंचशील के सिद्धांतों को दोनों देशों के मध्य मैत्री का मूल आधार स्वीकार किया गया। पंचशील के पाँच सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि इन सिद्धांतों को बराबर मान्यता प्राप्त हो रही है और इनका व्यापक प्रयोग संभव है। विश्व में तनाव, संदेह, भय तथा कटुता को कम करने के लिए इन सिद्धांतों के आधार पर पारस्परिक संबंध स्थापित करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। 25 जून, 1955 को भारत तथा पोलैंड के प्रधान मंत्रियों की संयुक्त विज्ञप्ति में भी इन्हीं पाँच सिद्धांतों पर बल दिया गया है। दिसंबर, 1955 में भारत सरकार के निमंत्रण पर रूस के प्रधान मंत्री श्री बुलगानिन तथा श्री क्रुश्चेव भारत आए थे। इस अवसर पर जो संयुक्त विज्ञप्ति प्रकाशित हुई उसमें पंचशील अथवा पाँच सिद्धांतों का स्पष्ट उल्लेख हुआ है और इन्हें विश्वशांति, अंतरराष्ट्रीय एवं सहयोग सद्भाव का मुख्य आधार माना गया है। अप्रैल, 1955 ई. में ऐतिहासिक बांदुंग सम्मेलन में एशिया अफ्रिका के 29 राष्ट्रों के सम्मेलन में विश्वशांति तथा सहयाग के जो 10 सूत्र सर्वमान्य किए गए थे उनमें से पाँच पंचशील के ही सिद्धांत हैं। इस सम्मेलन में भारत के प्रधान मंत्री श्री नेहरू ने पंचशील के सिद्धांतों की व्याख्या करते हुए उनके महत्व पर प्रकाश डाला था जिसका प्रभाव केवल एशिया तथा अफ्रिका के राष्ट्रों पर ही नहीं पड़ा बल्कि विश्व राजनीति में एक नए अध्याय का सूत्रपात हुआ। भारत, चीन, हिंदेशिया, बर्मा, वियतमिन्ह, हिंदचीन, युगोसलाविया ने प्रारम्भ में ही पंचशील के सिद्धांतों को स्वीकार किया। बांटुंग सम्मेलन में लंका, थाईलैंड, फिलिपाइंस, पाकिस्तान, तुर्की के अतिरिक्त एशिया अफ्रिका के चौबीस राष्ट्रों ने इसे मान्यता दी। सन् 1964 में तटस्थ राष्ट्रों का जो सम्मेलन संयुक्त अरब गणराज्य की राजधानी काहिरा में हुआ, उसमें भारत के प्रधान मंत्री श्री लालबहादुर शास्त्री ने सहअस्तित्व एवं पंचशील के सिद्धांतों का प्रभावपूर्ण ढंग से प्रतिपादन किया और इन सिद्धांतों को सम्मेलन में मान्यता मिली। जनवरी, 1966 में भारत औरपाकिस्तान के बीच जो ऐतिहासिक ताशकंद समझौता हुआ है, उसमें मतभेद एवं विवादों को हल करने के लिए शस्त्र का प्रयोग न करने, एक दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने तथा सहयोग, सद्भाव बढ़ाने के प्रयत्न के जो सिद्धांत मान्य हुए हैं, वे पंचशील के ही प्रमुख सिद्धांत हैं। इस प्रकार पंचशील भारत की परराष्ट्रनीति का मुख्य आधार तो है ही, विश्वशांति, अंतरराष्ट्रीय सद्भाव एवं सहयोग का भी प्रमुख प्रेरक बन गया है।

राजनीति शास्त्र की तैयारी हेतु कुछ बिंदु...........


अगर आप प्रारंभिक परीक्षा में सफल हो गए हैं, तो अब मुख्य परीक्षा की तैयारी के लिए बहुत कम समय आपके पास बचा है। इनमें वैकल्पिक विषयों के साथ ही सभी विषयों की गहन तैयारी निर्धारित समय सीमा के अंदर करनी होगी। मुख्य परीक्षा में अगर आपका वैकल्पिक विषय राजनीतिशास्त्र है, तो इसकी तैयारी के लिए अलग से स्ट्रेटेजी बनाना जरूरी है, तभी आप कम समय में बेहतर तैयारी करके अच्छे अंक प्राप्त कर सकते हैं।

बनाएं स्मार्ट स्ट्रेटेजी
किसी विषय में बेहतर करने के लिए सिलेबस का अध्ययन जरूरी है। परीक्षा मई में है, इस कारण आप सिलेबस के अनुरूप पढाई पूरी कर चुके होंगे। अब तैयारी को फाइनल टच देने के लिए अलग स्ट्रेटेजी की जरूरत है। पहले आप आइएएस में पूछे गए पिछले दस वर्षो के प्रश्नों को देखकर यह अंदाजा लगाएं कि किस सेक्शन से सर्वाधिक प्रश्न पूछे जा रहे हैं। उसके बाद महत्वपूर्ण सेक्शन पर ध्यान देकर पकड बनाएं। मुख्य परीक्षा में जीएस के प्रश्नपत्र में यह सबसे ज्यादा मदद पहुंचाने वाला विषय माना जाता है। यही कारण है कि इस विषय के स्टूडेंट्स को पहले प्रश्नपत्र में भारतीय संविधान और राजव्यवस्था और दूसरे पत्र में भारत और अंतरराष्ट्रीय संबंधों से संबंधित प्रश्नों के लिए अलग से तैयारी नहीं करनी पडती है। निबंध में भी यह मददगार होता है। इसके अलावा इंटरव्यू में भारतीय राजनीतिक व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय संबंध की समझ होने से इसके स्टूडेंट्स बेहतर स्थिति में होते हैं। अन्य विषयों की तैयारी की अपेक्षा इसके लिए अलग स्ट्रेटेजी फायदेमंद हो सकती है। आप उन क्षेत्रों को अधिक पढें, जिसमें जीएस और निबंध से प्रश्न आ सकते हैं और राजनीतिशास्त्र में भी प्रश्न पूछे जाते हैं। इसकी आप एक लिस्ट बना लें और उनकी जमकर तैयारी करें। इसके बाद आप उन अध्याय या क्षेत्रों का चुनाव करें, जिसमें प्रश्न किसी न किसी रूप में आते हैं। आप इस तरह की रणनीति बनाकर तैयारी करते हैं, तो आपकी तैयारी औरों से बेहतर हो सकती है।

करेंट से रहें अपडेट

पॉलिटिकल साइंस में बेहतर तैयारी के लिए आप एनसीईआरटी और इग्नू की पुस्तकों को आधार बनाएं और उसे खूब पढें। इससे आपका आधार मजबूत होगा और तैयारी करने में आसानी होगी। इसमें भारतीय राजनीतिक व्यवस्था, संविधान और अंतरराष्ट्रीय संबंधों से संबंधित करेंट प्रश्न भी काफी संख्या में होते हैं। इसकी तैयारी के लिए रोज न्यूज सुनने की आदत डालें और किसी एक राष्ट्रीय अखबार का अध्ययन करें। इंडियन गवर्नमेंट एंड पॉलिसी, सोशल मूवमेंट, नेचर ऑफ इंडियन फ्रीडम स्ट्रगल, फंडामेंटल राइट्स, इंडियन पार्टी सिस्टम, चैलेंज टू इंडियन डेमोक्रेसी आदि से संबंधित प्रश्नों की तैयारी करेंट को ध्यान में रखकर करेंगे, तो आप बेहतर उत्तर लिखने में सफल हो सकते हैं। आप चाहें, तो इस संबंध में अपने दोस्तों के साथ ग्रुप डिस्कशन भी कर सकते हैं। इससे आपकी समझ का दायरा बढेगा और आप बेहतर प्रदर्शन कर पाएंगे। आप निर्धारित समय-सीमा के अंदर घर पर ही पिछले वर्षो के प्रश्नों को सॉल्व करने का अभ्यास करें। इससे समय रहते अपनी कमजोरी दूर कर लेंगे और आगे बेहतर प्रदर्शन करने में

सफल हो सकेंगे।

इस परीक्षा में सफल होने के लिए समय प्रबंधन आवश्यक है। यदि आपको सिविल सेवा की मुख्य परीक्षा में अपनी सफलता सुनिश्चित करनी है, तो सभी प्रश्नपत्रों पर बराबर ध्यान दें। ऐसा न हो कि एक पेपर में आप खूब मेहनत करें और दूसरे पर कम ध्यान दें। यदि आप सभी प्रश्नपत्रों में अधिकाधिक अंक हासिल करेंगे, तो सिविल सेवा में आपका चयन काफी हद तक सुनिश्चित हो जाएगा। मुख्य परीक्षा के कुल 2000 अंकों में से यह आप पर निर्भर करता है कि आप इसमें से कितने अंक बटोर पाते हैं। आप मुख्य परीक्षा में जितने ज्यादा अंक पाएंगे, उससे न केवल इस परीक्षा में आपकी सफलता पक्की होगी, बल्कि आप मेरिट लिस्ट में ऊपरी स्थान पाकर आइएएस, आइपीएस, र्आएफएस या समकक्ष कैडर के अधिकारी बन सकेंगे।

नोट्स बनाकर तैयारी करें।

उत्तर लिखने का खूब अभ्यास करें।

टाइम मैनजमेंट पर ध्यान दें।

सभी प्रश्नों पर बराबर का समय दें।

देश-विदेश की प्रमुख घटनाओं पर रखें नजर

जीएस में मददगार

इंटरव्यू में भी सहायक

सेलेक्टिव अप्रोच जरूरी

करें इग्नू और एनसीईआरटी का अध्ययन

राष्ट्रपति चुनाव:एक मूल्यांकन


संविधान के निर्माण के वक़्त ही यह तय हुआ कि देश को न केवल प्रधानमंत्री, बल्कि राष्ट्रपति भी मिले. संविधान के अनुच्छेद 52 के अनुसार, भारत का एक राष्ट्रपति होना अनिवार्य है, जिसका कार्यकाल पांच वर्ष का हो. राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी को 15,000 रुपये की ज़मानत राशि के साथ अपना नामांकन दाखिला करना होता है. इसके साथ ही उसे कम से कम पचास मतदाताओं (सांसद/विधायक) के प्रस्ताव और समर्थन की ज़रूरत होती है. राष्ट्रपति चुनाव भी चुनाव आयोग ही कराता है.
एक व्यक्ति को राष्ट्रपति बनने के लिए कुछ अनिवार्य शर्तें हैं, जिनमें प्रमुख हैं:-
  1. वह भारत का नागरिक हो.
  2. उसने कम से कम 35 वर्ष की आयु पूर्ण कर ली हो.
  3. वह लोकसभा का सदस्य बनने की पात्रता रखता हो.
  4. राष्ट्रपति बनने के बाद उम्मीदवार संसद के किसी भी सदन या राज्यों की किसी भी विधानसभा/विधान परिषद का सदस्य नहीं होना चाहिए.
  5. वह भारत सरकार के अंतर्गत किसी भी लाभ के पद पर न हो.
भारत में राष्ट्रपति का चयन सीधे-सीधे जनता नहीं करती है, लेकिन वह अप्रत्यक्ष रूप से इस चुनाव में सम्मिलित होती है. राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार को जनता का वोट उसके प्रतिनिधि यानी क्षेत्र के विधायक के ज़रिए मिलता है. राष्ट्रपति के चुनाव में लोकसभा, राज्यसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य मतदान करते हैं. राष्ट्रपति चुनाव में कोई भी पार्टी व्हिप नहीं जारी करती है यानी यह ज़रूरी नहीं है कि किसी भी पार्टी के सदस्य उस पार्टी द्वारा प्रस्तावित उम्मीदवार को ही वोट करेंगे. चूंकि राष्ट्रपति चुनाव में गुप्त मतदान होता है, इसलिए इसका खुलासा नहीं हो पाता है कि किस सांसद/विधायक ने किस उम्मीदवार को वोट दिया. देश में छह राज्य ऐसे हैं, जहां विधानसभा के साथ-साथ विधान परिषद भी है, लेकिन इस चुनाव में केवल राज्यों के निचले सदन (विधानसभा) के सदस्य ही मतदान में भाग ले सकते हैं. देश में सभी राज्यों में उच्च सदन (विधान परिषद) नहीं है. सभी राज्यों में एकरूपता और समानता बनी रहे, इसलिए केवल विधानसभा के सदस्यों को ही राष्ट्रपति के चुनाव में मत देने का प्रावधान है. विधानसभा में ऐसे विधायक, जो राज्यपाल द्वारा मनोनीत किए जाते हैं, वे किसी क्षेत्र विशेष की जनता का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं, इसलिए राष्ट्रपति के  चुनाव में उन्हें मतदान का अधिकार नहीं होता है. ठीक यही नियम लोकसभा और राज्यसभा में मनोनीत सदस्यों पर लागू होता है. राज्यसभा के वे सदस्य, जिन्हें अपने क्षेत्र में विशिष्ट पहचान और स्थान बनाने की वजह से मनोनीत किया गया है, भी राष्ट्रपति के चुनाव में अपना वोट नहीं डाल सकते. उदाहरण के तौर पर इस बार के राष्ट्रपति चुनाव में राज्यसभा सदस्य क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर, अभिनेत्री रेखा एवं अनु आगा अपना वोट नहीं डाल सकेंगे. इसी तरह लोकसभा में मनोनीत किए जाने वाले एंग्लो इंडियन सदस्य भी राष्ट्रपति चुनाव में मतदान नहीं कर सकते हैं.
अब यह जानते हैं कि आ़िखर राष्ट्रपति चुनाव में मतदान किस प्रकार होता है:-
भले ही 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या 1.2 अरब है, लेकिन अभी भी भारत में चुनावों के लिए 1971 की जनगणना के आंकड़ों को आधार माना जाता है. 2026 तक 1971 की जनगणना के आधार पर ही चुनाव संपन्न होंगे. राष्ट्रपति चुनाव के लिए ़खास प्रकार का फार्मूला तय किया गया है, जिससे बिना किसी पक्षपात या गड़बड़ी के यह चुनाव सही तरीक़े से संपन्न हो सके. इसके लिए यह जानना ज़रूरी है कि राष्ट्रपति चुनाव में प्रत्येक मतदाता का मत एक मत के रूप में नहीं गिना जाता है. सांसदों के वोट की वैल्यू तो समान होती है, मगर हर राज्य के विधायक के वोट की वैल्यू अलग-अलग होती है. दोनों सदनों के निर्वाचित सांसदों के वोट की वैल्यू सभी राज्यों के विधायकों की कुल वोट वैल्यू के बराबर होती है.
राष्ट्रपति चुनाव में इस्तेमाल होने वाले फार्मूले के आधार पर वोट वैल्यू निकालने के तीन चरण हैं:-
  1. सबसे पहले हर राज्य के विधायक के वोट की वैल्यू निकाली जाती है.
  2. विधायकों की संख्या के आधार पर उस राज्य के  कुल वोटों की वैल्यू निकाली जाती है.
  3.  देश के कुल विधायकों की संख्या और वोट वैल्यू के आधार पर लोकसभा और राज्यसभा के सांसदों के वोट की वैल्यू निकाली जाती है.
इस प्रक्रिया से गुज़रते हुए राष्ट्रपति चुनाव में पड़ने वाले कुल वोटों की गणना की जाती है. चुनाव में पड़ने वाले कुल वोटों की वैल्यू निकाली जा सकती है.
  • राज्य के विधायक के वोट की वैल्यू यानी संख्या निकालने के लिए:- 1971 की जनगणना के अनुसार, राज्य की जनसंख्या को वहां की विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों की संख्या से भाग दिया जाए, परिणाम में जो भी संख्या आए, उसे फिर से 1000 से भाग दिया जाए. इसके बाद जो परिणाम निकलेगा, वह उस राज्य के एक विधायक के वोट की वैल्यू होगी. इस तरह प्रत्येक राज्य के विधायकों के वोट की वैल्यू निकाली जाती है.
  • राज्य की कुल वोट वैल्यू निकालने के लिए:- राज्य के कुल विधायकों के वोटों की वैल्यू निकालने के लिए एक विधायक के वोट की वैल्यू को राज्य विधानसभा के कुल विधायकों की संख्या से गुणा किया जाए. इससे जो परिणाम आएगा, वह उस राज्य का कुल वोट होगा. इसी तरह हर राज्य अपनी भागीदारी राष्ट्रपति चुनाव में सुनिश्चित करता है.
  • सांसदों के वोट की वैल्यू निकालने के लिए:- सांसदों के वोट की वैल्यू निकालने के लिए संसद के निर्वाचित सदस्यों की संख्या को जोड़ते हैं. लोकसभा और राज्यसभा के निर्वाचित सदस्यों को जोड़कर जो परिणाम आए, उससे राज्यों के कुल वोट में भाग देते हैं. इससे जो परिणाम आए, वह एक सांसद के वोट की वैल्यू होगी. कुल सांसदों के वोटों की वैल्यू निकालने के लिए कुल सांसदों की संख्या को एक सांसद के वोट की वैल्यू से गुणा करते हैं. अब राष्ट्रपति चुनाव में मतदाताओं के वोटों की वैल्यू निकालने के लिए कुल सांसदों और कुल विधायकों के वोटों की वैल्यू जोड़ेंगे, जो परिणाम आए, वह मतदान में कुल पड़ने वाले वोटों की संख्या होगी.
नियम यह है कि राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार व्यक्ति को चुनाव जीतने के लिए 50 प्रतिशत से ज़्यादा वोट पाना आवश्यक होता है. मतलब यह कि 50 प्रतिशत के अलावा 1 और वोट उम्मीदवार के पक्ष में आना ज़रूरी है. राष्ट्रपति पद का चुनाव मल्टी कैंडिडेट इलेक्शन होता है यानी इस चुनाव में दो से ज़्यादा उम्मीदवार खड़े हो सकते हैं, इसलिए ज़्यादातर यह संभव नहीं है कि किसी भी उम्मीदवार को निर्वाचन के लिए 50 प्रतिशत से ज़्यादा वोट मिल सकें. इसलिए ट्रांसफरेबल वोट सिस्टम का प्रावधान है. देश के छठवें राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी इस मामले में अपवाद रहे हैं. वह ऐसे राष्ट्रपति हुए, जिनके खिलाफ कोई अन्य प्रत्याशी खड़ा नहीं हुआ था और इसीलिए वह निर्विरोध यानी अनअपोज्ड राष्ट्रपति बने थे. एक सही उम्मीदवार चुनने का एक खास तरीक़ा है, जिसे उदाहरण के साथ समझते हैं.
सबसे पहले यह जान लें कि राष्ट्रपति चुनाव में प्रिफ्रेंसियल सिस्टम वोटिंग होता है यानी मतदाताओं को सभी प्रत्याशियों को अपनी पसंद के क्रम के अनुसार वोट करना ज़रूरी होता है. मान लें कि 4 लोग अ, ब, स, द राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार हैं, उन्हें सभी मतदाता अपनी इच्छा से पहली पसंद, दूसरी पसंद, तीसरी और फिर चौथी पसंद के क्रम के अनुसार वोट देंगे. मान लें कि इनमें अ को 30 प्रतिशत वोट मिले, ब को 12 प्रतिशत वोट मिले, स को 40 प्रतिशत वोट मिले और द को 18 प्रतिशत वोट मिले. ऐसे में सबसे कम वोट पाने वाले प्रत्याशी को बाहर कर दिया जाता है. बाहर किए गए उम्मीदवार को मिले वोटों को उसमें वर्णित सेकेंड प्रिफ्रेंस के आधार पर अन्य उम्मीदवारों के वोटों में शामिल कर दिया जाता है. एलिमिनेशन की यह प्रक्रिया तब तक जारी रहती है, जब तक किसी भी उम्मीदवार को 50 प्रतिशत से ज़्यादा वोट न मिल जाएं. 50 प्रतिशत से ज़्यादा वोट पाने वाले प्रत्याशी को निर्वाचित घोषित कर दिया जाता है. आज तक भारत में राष्ट्रपति निर्वाचन की प्रक्रिया में एक बार ही दूसरे दौर की गिनती की गई है. 1969 में हुए चुनाव में वोटों की गिनती सेकेंड प्रिफ्रेंस के हिसाब से हुई थी. इसके बाद वी वी गिरि निर्वाचित घोषित किए गए थे. यह चुनाव इस तरह अपवाद है. इसके अलावा आज तक दूसरे दौर तक वोटों की गिनती की आवश्यकता नहीं पड़ी.
राष्ट्रपति चुनाव में मतदाताओं के लिए कुछ विशेष प्रावधान हैं:-
यदि किसी राज्य में विधानसभा किसी भी कारणवश निलंबित हो, फिर भी उसके निर्वाचित सदस्य राष्ट्रपति चुनाव में भाग ले सकते हैं. 1967 में राजस्थान विधानसभा के निलंबित होने के बावजूद निर्वाचित सदस्यों ने अपना वोट दिया था. इसी तरह बिहार विधानसभा भी 1969 में निलंबित थी, मगर निर्वाचित सदस्यों ने राष्ट्रपति चुनाव में अपना वोट डाला था.
1950 के बाद देश के 12 राष्ट्रपति हुए हैं, जिनमें कुछ ऐसे हैं, जो विशेष प्रकार से राष्ट्रपति रहे हैं.
  • देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद अब तक के अकेले ऐसे राष्ट्रपति हैं, जो लगातार दो बार राष्ट्रपति बने थे.
  • देश के दो राष्ट्रपति ज़ाकिर हुसैन और फ़खरुद्दीन अली अहमद की मौत उनके कार्यकाल के दौरान हो गई थी, जिसके बाद तत्काल तौर पर उप राष्ट्रपति ने राष्ट्रपति का पद संभाला.
  • ज़ाकिर हुसैन की कार्यकाल के दूसरे वर्ष (1969) में मृत्यु के बाद तत्कालीन उप राष्ट्रपति वी वी गिरि कार्यवाहक राष्ट्रपति बने. उसके कुछ माह बाद ही राष्ट्रपति चुनाव में खड़े होने के लिए उन्होंने कार्यवाहक राष्ट्रपति के पद से इस्ती़फा दे दिया था, लेकिन चुनाव में वह हार गए और उनकी जगह मोहम्मद हिदायतुल्ला कार्यकारी राष्ट्रपति बने. फिर हुए चुनाव में वी वी गिरि खड़े हुए और उन्हें जीत मिली. इस तरह वी वी गिरि ऐसे राष्ट्रपति हुए, जो उप राष्ट्रपति रहते हुए कार्यवाहक राष्ट्रपति बने और बाद में चुनाव जीतकर राष्ट्रपति भी बने.
  • वी वी गिरि के बाद फ़खरुद्दीन अली अहमद राष्ट्रपति बने, लेकिन कार्यकाल के दौरान ही उनकी मृत्यु हो गई, तब तत्कालीन उप राष्ट्रपति बसप्पा दनप्पा जट्टी कार्यवाहक राष्ट्रपति बने थे.
  • वर्तमान में इस पद की शोभा बढ़ा रहीं प्रतिभा देवी सिंह पाटिल देश की पहली महिला राष्ट्रपति हैं.

शिमला समझौता:एक मूल्यांकन


शिमला समझौते के 40 साल
































चालीस साल पहले ठीक 3 जुलाई  के दिन भारत-पाकिस्तान के बीच शिमला समझौता हुआ था। सन 1972 में भारत-पाक युद्ध के बाद शिमला में एक संधि पर हस्ताक्षर हुए, जिसे शिमला समझौता कहा जाता है। इसमें भारत की तरफ से इंदिरा गाधी और पाकिस्तान की तरफ से जुल्फिकार अली भुट्टो शामिल थे। बहरहाल, कल यानी बुधवार को भारत-पाक के बीच विदेश सचिव स्तर वार्ता शुरू होगी। आतंकवादी हमले में पाकिस्तान सरकार की भूमिका और मौत की सजा पाए सरबजीत से संबंधित मुद्दों का असर बुधवार से शुरू हो रही दो दिवसीय विदेश सचिव स्तरीय वार्ता पर पड़ सकता है।

कल भरोसा बढ़ाने के उपायों पर चर्चा होगी...

भारत के विदेश सचिव रंजन मथाई और उनके पाकिस्तानी समकक्ष जलील अब्बास जिलानी इस दौरान शाति और सुरक्षा, विश्वास बहाली, जम्मू एवं कश्मीर और दोस्ताना लेन-देन जैसे मुद्दों पर चर्चा करने वाले हैं। वार्ता के लिए जिलानी मंगलवार को यहा पहुंचे। वार्ता के मुद्दे हालाकि पहले ही तय हो चुके थे, लेकिन 26/11 आतंकवादी हमले के एक प्रमुख सूत्रधार द्वारा हमले में पाकिस्तान सरकार की भूमिका का खुलासा करने और भारत द्वारा पाकिस्तान पर इस भूमिका को स्वीकार करने के लिए दबाव बनाने से माहौल में बदलाव आ गया है। विदेश सचिव स्तरीय वार्ता में आतंकवाद का मसला छाए रहने की संभावना है। ऐसा अबू जिंदाल के ताजा खुलासों के मद्देनजर कहा जा रहा है। हालाकि, बातचीत के दौरान आतंकवाद का मसला विचारणीय नहीं है। लेकिन इस दौरान भरोसा बढ़ाने के कदमों पर चर्चा होगी, जिसके चलते पाक को 26/11 के दोषियों को जल्द सजा दिला कर भरोसा बढ़ाने की जरूरत बताई जाएगी। भारत पर दबाव बढ़ाने के लिए पाकिस्तान सियाचिन और सर क्रीक समझौता जल्द करने की बात भी कहेगा।

चालीस साल पहले किया था भरोसा.......

जुलफिकार अली भुट्टो ने 20 दिसंबर, 1971 को पाकिस्तान के राष्ट्रपति का पदभार संभाला। उन्हें विरासत में एक टूटा हुआ पाकिस्तान मिला। सत्ता सभालते ही भुट्टो ने यह वादा किया कि वह शीघ्र ही बाग्लादेश को फिर से पाकिस्तान में शामिल करा लेंगे। पाकिस्तानी सेना के अनेक अधिकारियों को, देश की पराजय के लिए उत्तरदायी मान कर, बरखास्त कर दिया गया था। कई महीने तक चलने वाली राजनीतिक-स्तर की बातचीत के बाद जून, 1972 के अंत में शिमला में भारत-पाकिस्तान शिखर बैठक हुई।

ये थे समझौते के बिंदु ......

इंदिरा गाधी और भुट्टो ने, अपने उच्चस्तरीय मंत्रियों और अधिकारियों के साथ, उन सभी विषयों पर चर्चा की, जो 1971 के युद्ध से उत्पन्न हुए थे। साथ ही उन्होंने दोनों देशों के अन्य प्रश्नों पर भी बातचीत की। इनमें मुख विषय थे, युद्ध बंदियों की अदला-बदली, पाकिस्तान द्वारा बाग्लादेश को मान्यता का प्रश्न, भारत और पाकिस्तान के राजनयिक संबंधों को सामान्य बनाना, व्यापार फिर से शुरू करना और कश्मीर में नियंत्रण रेखा स्थापित करना। लंबी बातचीत के बाद भुट्टो इस बात के लिए सहमत हुए कि भारत-पाकिस्तान संबंधों को केवल द्विपक्षीय बातचीत से तय किया जाएगा। शिमला समझौते के अंत में एक समझौते पर इंदिरा गाधी और भुट्टो ने हस्ताक्षर किए।

स्थाई मित्रता का किया था वादा .........

इनमें यह प्रावधान किया गया कि दोनों देश अपने संघर्ष और विवाद समाप्त करने का प्रयास करेंगे, और यह वचन दिया गया कि उप-महाद्वीप में स्थाई मित्रता के लिए कार्य किया जाएगा।

1.सीधी बात करेंगे :: इन उद्देश्यों के लिए इंदिरा गाधी और भुट्टो ने यह तय किया कि दोनों देश सभी विवादों और समस्याओं के शातिपूर्ण समाधान के लिए सीधी बातचीत करेंगे और स्थिति में एकतरफा कार्यवाही करके कोई परिवर्तन नहीं करेंगे। वे एक दूसरे के विरुद्घ न तो बल प्रयोग करेंगे, न प्रादेशिक अखण्डता की अवेहलना करेंगे और न एक दूसरे की राजनीतिक स्वतंत्रता में कोई हस्तक्षेप करेंगे। दोनों ही सरकारें एक दूसरे देश के विरुद्घ प्रचार को रोकेंगी और समाचारों को प्रोत्साहन देंगी, जिनसे संबंधों में मित्रता का विकास हो। दोनों देशों के संबंधों को सामान्य बनाने के लिए सभी संचार संबंध फिर से स्थापित किए जाएंगे।

2.आवागमन की सुविधाएं :: आवागमन की सुविधाएं स्थापित की जाएंगी ताकि दोनों देशों के लोग असानी से आ-जा सकें और घनिष्ठ संबंध स्थापित कर सकें।

3.व्यापार बढ़ाएंगे :: जहा तक संभव होगा व्यापार और आर्थिक सहयोग शीघ्र ही फिर से स्थापित किए जाएंगे।

4.सहयोग करेंगे :: विज्ञान और संस्कृति के क्षेत्र में आपसी आदान-प्रदान को प्रोत्साहन दिया जाएगा।

5.नियंत्रण रेखा :: स्थाई शाति के हित में दोनों सरकारें इस बात के लिए सहमत हुई कि भारत और पाकिस्तान दोनों की सेनाएं अपने-अपने प्रदेशों में वापस चली जाएंगी। दोनों देशों ने 17 सितंबर, 1971 की युद्ध विराम रेखा को नियंत्रण रेखा के रूप में मान्यता दी और यह तय हुआ कि इस समझौते के बीस दिन के अंदर सेनाएं अपनी-अपनी सीमा से पीछे चली जाएंगी। यह तय किया गया कि भविष्य में दोनों सरकारों के अध्यक्ष मिलते रहेंगे और इस बीच अपने संबंध सामान्य बनाने के लिए दोनों देशों के अधिकारी बातचीत करते रहेंगे।

किसे हुआ फायदा-किसे नुकसान ? ......

भारत में शिमला समझौते का आलोचकों ने विरोध किया। कहा कि यह समझौता तो एक प्रकार से पाकिस्तान के सामने भारत का समर्पण था क्योंकि भारत की सेनाओं ने पाकिस्तान के जिन प्रदेशों पर अधिकार किया था अब उन्हें छोड़ना पड़ा। परंतु शिमला समझौते का सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि दोनों देशों ने अपने विवादों को आपसी बातचीत से निपटाने का निर्णय किया। इसका यह अर्थ हुआ कि कश्मीर विवाद को अंतरराष्ट्रीय रूप न देकर अन्य विवादों की तरह आपसी बातचीत से सुलझाया जाएगा।